परमेश्वर का प्रेम
यहुन्ना 3 के 16 पद में लिखा है, “परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम किया कि उसने अपना इकलौता बेटा दे दिया कि जो कोई उस पर विश्वास लाए वह नाश न हो वरण अनन्त जीवन पाए।”
मनुष्य पापी है
वचन कहता है, “सबने पाप किया है और सभी परमेश्वर की महिमा से रहित हैं।”
मनुष्य की रचना इसलिए की गई थी कि वह परमेश्वर के साथ संगति करे पर अपने ढीठ, तथा अपनी मर्ज़ी पर चलने के स्वभाव के कारण उसने अपनी रीति से आज़ादी से चलने को चुन लिया। इसी कारण परमेश्वर से उसकी संगति टूट गई थी। यही निजि इच्छा जो विद्रोह के व्यवहार या कुछ भी न करने के द्वारा प्रकट होती है, इसी को बाइबल पाप का नाम देती है।
हमे यीशु मसीह को ग्रहण करना है
वचन यहुन्ना 1 अध्याय के 12 पद में कहता है, “जितनों ने उसे ग्रहण किया उसने उनको अपनी संतान होने का अधिकार दिया है। उनको भी जो उसके नाम पर विश्वास करते हैं।”
हम य़ीशु को विश्वास से ग्रहण करते हैं
इफि. के 2 अध्याय का 8 और 9 पद कहता है, “क्योंकि विश्वास के द्वारा अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है और यह तुम्हारी ओर से नहीं है वरण परमेश्वर का दान है और न कर्मों के कारण नहीं कि कोई इस पर घमण्ड करे।” जब हम यीशु को ग्रहण करते हैं तब हम एक नए जन्म का अनुभव करते हैं
क्या यह प्रार्थना आप के दिल की इच्छा है?
हाँ,