# परमेश्वर कौन

1. परमेश्वर आप से प्रेम करता है और आपके जीवन के लिए एक अदभुत योजना देता है।

परमेश्वर का प्रेम

यहुन्ना 3 के 16 पद में लिखा है, “परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम किया कि उसने अपना इकलौता बेटा दे दिया कि जो कोई उस पर विश्वास लाए वह नाश न हो वरण अनन्त जीवन पाए।”

2. मनुष्य पापी है और परमेश्वर से अलग है। इस कारण वह परमेश्वर के प्रेम को अनुभव नहीं कर पाता है।

मनुष्य पापी है

वचन कहता है, “सबने पाप किया है और सभी परमेश्वर की महिमा से रहित हैं।”

मनुष्य की रचना इसलिए की गई थी कि वह परमेश्वर के साथ संगति करे पर अपने ढीठ, तथा अपनी मर्ज़ी पर चलने के स्वभाव के कारण उसने अपनी रीति से आज़ादी से चलने को चुन लिया। इसी कारण परमेश्वर से उसकी संगति टूट गई थी। यही निजि इच्छा जो विद्रोह के व्यवहार या कुछ भी न करने के द्वारा प्रकट होती है, इसी को बाइबल पाप का नाम देती है।

3. यीशु मसीह ही परमेश्वर का मनुष्य के पाप के लिए एकमात्र प्रयोजन है।

यीशु ही हमारी जगह मारा गया था।

वचन कहता है, “जब हम पापी ही थे तब यीशु ने हमारे लिए अपने प्राण दिये थे।” (रोम.5 का 8 पद)

वह मुर्दों में से जी उठा था

1 कुर. 15 अध्याय के 3 से 6 पद में लिखा है,  “यीशु हमारे पापों के लिये मरा था... वह गाड़ा गया... और तीसरे दिन वचन के अनुसार मुर्दों में से जी उठा। फिर वह अपने 12 चेलों के सामने प्रकट हुआ। और उसके बाद वह 500 से भी अधिक लोगों को दिखाई दिया था।”

4. हमे निजि रूप से यीशु को अपना उद्धारकर्ता ग्रहण करना है

हमे यीशु मसीह को ग्रहण करना है

वचन यहुन्ना 1 अध्याय के 12 पद में कहता है, “जितनों ने उसे ग्रहण किया उसने उनको अपनी संतान होने का अधिकार दिया है। उनको भी जो उसके नाम पर विश्वास करते हैं।”

हम य़ीशु को विश्वास से ग्रहण करते हैं

इफि. के 2 अध्याय का 8 और 9 पद कहता है, “क्योंकि विश्वास के द्वारा अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है और यह तुम्हारी ओर से नहीं है वरण परमेश्वर का दान है और न कर्मों के कारण नहीं कि कोई इस पर घमण्ड करे।” जब हम यीशु को ग्रहण करते हैं तब हम एक नए जन्म का अनुभव करते हैं

क्या यह प्रार्थना आप के दिल की इच्छा  है?

हाँ,
मैं ने अभी यह प्रार्थना की है
और मैं चाहती हूँ कि आप भी जान लें।


नहीं,
पर प्रार्थना करने से पहले
मेरे दिल में एक प्रश्न है